सोमवार, 23 जनवरी 2017

क्रेडिट कार्ड बिल का न्यूनतम भुगतान बिगाड़ सकता है आपकी वित्तीय सेहत

नोटबंदी के बाद से कैशलेस ट्रांजेक्शन तेजी से बढ़ा है। इसके चलते प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल भी कई गुना बढ़ गया है।
नोटबंदी के बाद से कैशलेस ट्रांजेक्शन तेजी से बढ़ा है। इसके चलते प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल भी कई गुना बढ़ गया है। बैंक भी अपने कस्टमर बेस बढ़ाने के लिए धड़ल्ले से क्रेडिट कार्ड दे रहे हैं। बिना पैसा दिए 45 दिन के क्रेडिट पीरियड से इसकी लोकप्रियता और बढ़ गई है। अगर आप भी कैशलेस भुगतान में क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल जमकर कर रहे हैं तो थोड़ा संभल जाइए। इससे आपका बजट बिगड़ सकता है। क्रेडिट कार्ड आपका दोस्त तब तक बना रहेगा, जब तक आप तय समय सीमा के अंदर पूरे बिल का भुगतान कर देते हैं। अगर आप बजट से बाहर जाकर खरीदारी कर लेते हैं और पूरा बिल नहीं चुका पाते हैं तो आपके पास दो विकल्प  होते हैं- मिनिमम बैलेंस भरें या बिल का भुगतान मासिक किस्तों में करें। आइए जानते हैं कि इन दोनों विकल्पों का आपकी फाइनेंशियल सेहत पर क्या असर होता है।
न्यूनतम भुगतान का असर
न्यूनतम भुगतान करने से बकाया रकम चुकाने की अवधि तो बढ़ जाती है, लेकिन आप अपनी मेहनत की कमाई, ऊंचेे ब्याज में लुटा देते हैं। क्रेडिट कार्ड की बकाया रकम पर 2 से 3 फीसदी प्रति माह ब्याज भुगतान करना होता है। इस तरह आप पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है। आपको सालाना 36 से 40 फीसदी ब्याज चुकाना होता है। आप खुद ही समझ सकते हैं कि इतनी मोटी ब्याज दर आपकी मेहनत की कमाई पर किस तरह चुना लगा सकती है।
बकाया राशि को ईएमआई में बदलना
जब आप क्रेडिट कार्ड से बड़ी रकम का भुगतान या खरीदारी करते हंैं तो बैंक की ओर से आपको एसएमएस या फोन कर उसको ईएमआई में बदलने का विकल्प दिया जाता है। यह विकल्प आपको काफी आकर्षक दिखता है, लेकिन इसमें भी नुकसान है। ईएमआई में बदलने पर बैंक आपसे एक तय फीसदी का प्रोसेसिंग चार्ज वसूल करते हैं। और फिर बकाया रकम पर ईएमआई वसूल करते हैं। आपके पास पैसा आने के बाद अगर आप समय से पहले चुकाना भी चाहते हैं तो बैंक प्रीक्लोजर चार्ज लगाते हैं। यानी समय से पहले भुगतान पर भी वे आपसे पैसा वसूल करते हैं।

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